
अमर गाथा संवाददाता/पटना, डॉ. रूद्र किंकर वर्मा । संतमत-सत्संग परंपरा के युगद्रष्टा संत, अध्यात्म जगत के प्रकाश स्तंभ एवं करोड़ों श्रद्धालुओं के प्रेरणास्रोत प्रात:स्मरणीय अनंत श्री विभूषित त्रय लोक पावन महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के उत्तराधिकारी रहे उनके मष्तिष्क स्वरूप महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज के महापरिनिर्वाण दिवस पर देश-विदेश के विभिन्न सत्संग मंदिरों, आश्रमों एवं आध्यात्मिक केंद्रों में श्रद्धा और भक्ति के साथ पुण्यतिथि मनाई गई। इस अवसर पर विशेष सत्संग, ध्यान, भजन-कीर्तन और श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन कर उनके जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया गया।
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि महर्षि संतसेवी परमहंस केवल एक संत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना के ऐसे संत थे जिन्होंने लाखों लोगों को आत्मज्ञान, सदाचार और मानवता का मार्ग दिखाया। उनका संपूर्ण जीवन लोकमंगल, आत्मकल्याण और आध्यात्मिक जागरण को समर्पित रहा।
वक्ताओं ने कहा कि महर्षि जी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। उन्होंने लोगों को बाहरी आडंबरों और अंधविश्वासों से दूर रहकर अपने भीतर ईश्वर की खोज करने का मार्ग बताया। उनका मानना था कि मनुष्य का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वह आत्मचिंतन, ध्यान और सत्संग के माध्यम से अपने अंतर्मन को निर्मल बनाए।
सभा में उनके अमर वचनों का स्मरण करते हुए कहा गया कि— “जल स्नान से तन शुद्धि, सत्संग से मन शुद्धि और अंतर में गोता लगाने से आत्मा की शुद्धि होती है।” यह संदेश आज भी साधकों के लिए जीवन-दर्शन का आधार बना हुआ है।
वक्ताओं ने कहा कि महर्षि संतसेवी परमहंस ने संतमत की प्राचीन साधना पद्धति को जन-जन तक पहुंचाकर अध्यात्म को सरल और सहज बनाया। उन्होंने मानव जीवन को ईश्वर प्राप्ति का दुर्लभ अवसर बताते हुए प्रेम, करुणा, सेवा, संयम और नैतिकता को जीवन का मूल मंत्र बताया। श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने सामूहिक ध्यान, भजन-कीर्तन और सत्संग के माध्यम से उन्हें भावपूर्ण नमन किया। कई स्थानों पर गरीबों के बीच वस्त्र एवं खाद्य सामग्री का वितरण भी किया गया। वक्ताओं ने कहा कि महर्षि जी का जीवन और उनका दर्शन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
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